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Arts

Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

  • 21 episodes
  • Updated Today

Episodes21

  • Today · 2 min

    Hai Daiyya | Nilesh Raghuvanshi

    हाय दैया । नीलेश रघुवंशी एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी बिंदी ओंठों पर लाली ठोड़ी पर सात टिकुली काली धोती के संग चटक हरे रंग का पोलका हाथ में गिलट के कड़े और बाजुबंद गले में हँसली बजट्टी माथे पर गिलट की बेड़ी लगाए कमर में करधौनी और पाँव में आयलें संग में आँवड़ा कड़ा भी स्त्री के सिर पर टोकरी टोकरी में फल हैं चमकदार और रंगीन सचमुच की फल बेचने वाली अगर इसे देख ले तो हँसेगी कितना हाय दैया हाय दैया करते हो जाएगी लोट-पोट अगर फलों की टोकरी लिए खड़ी हो जाए कोने में तो क्या लगेगी वह भी इतनी लुभावनी और इतनी ही सुंदर धत्- झटक देगी सर को और कहेगी इसको बनाने वाले की मति फिर गई है चौराहे पर मुझ जैसी कई हर दिन सिर पर टोकरी लिए बेचती हैं फल जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को भरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते आग लगे ससुरों की हँसी ठिठोली को मूँछोंबारों की मूँछें बर जाएँ हमीं को सजा लिए अपने घर में हाय दैया..

  • Yesterday · 2 min

    Prem Ka Sparsh | Rabindranath Tagore | Translation - Hazari Prasad Dwivedi

    प्रेम का स्पर्श । रवींद्रनाथ टैगोर अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी हे भुवन, मैंने जब तक तुम्हें प्यार नहीं किया था तब तक तुम्हारा प्रकाश खोज-खोजकर (भी) अपना सारा धन नहीं पा सका था! उस समय तक समूचा आकाश हाथ में अपना दीप लिए हर सूनेपन में बाट जोह रहा था। मेरा प्रेम गान गाता हुआ आया, (फिर न जाने) क्या कानाफूसी हुई, उसने डाल दी तुम्हारे गले में अपने गले की माला! मुग्ध नयनों से हँसकर उसने तुम्हें चुपचाप कुछ दे दिया, (ऐसा-कुछ) जो तुम्हारे गोपन हृदय-पट पर चिरकाल तक बना रहेगा, तारा-हार में पिरोया हुआ!

  • Thursday · 3 min

    Ameeri Rekha | Kumar Ambuj

    अमीरी रेखा - कुमार अम्बुज मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ ऐसा होता आया है, बावजूद इसके कि कई चीज़ें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं और कई बार आदमी होने की शुरुआत एक आधी-अधूरी दीवार हो जाने से, पतंगा, ग्वारपाठा या एक पोखर बन जाने से भी होती है या जब सब रफ़्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरुआत है बशर्ते मनुष्यता में तुम्हारा विश्वास बाक़ी रह गया हो नमस्कार, हाथ मिलाना, मुस्कुराना, कहना कि मैं आपके क्या काम आ सकता हूँ— ये अभिनय की सहज भंगिमाएँ हैं और इनसे अब किसी को कोई ख़ुशी नहीं मिलती शब्दों के मानी इस तरह भी ख़त्म किए जाते हैं तब अपने को और अपनी भाषा को बचाने के लिए हो सकता है तुम्हें उस आदमी के पास जाना पड़े जो इस वक़्त नमक भी नहीं ख़रीद पा रहा है या घर की ही उस स्त्री के पास जो दिन रात काम करती है और जिसे आज भी मज़दूरी नहीं मिलती बाज़ार में तो तुम्हारी छाया भी नज़र नहीं आ सकती उसे दूसरी तरफ़ से आती रोशनी दबोच लेती है वसंत में तुम्हारी पत्तियाँ नहीं झरतीं एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है कि तुम नश्वर नहीं रहे तुम्हें यह देखने के लिए जीवित रहना पड़ सकता है कि सिर्फ़ अपनी जान बचाने की ख़ातिर तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो जब लोगों को रोटी भी नसीब नहीं और इसी वजह से साठ-सत्तर रुपए रोज़ पर तुम एक आदमी को और सौ-डेढ़ सौ रुपए रोज़ पर एक पूरे परिवार को ग़ुलाम बनाते हो और फिर रात की अगवानी में कुछ मदहोशी में सोचते हो कभी-कभी घोषणा भी करते हो— मैं अपनी मेहनत और क़ाबलियत से ही यहाँ तक पहुँचा हूँ।

  • Wednesday · 2 min

    Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke | Shivmangal Singh Suman

    हम पंछी उन्मुक्त गगन के । शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंचखोल चुगते तारक-अनार के दाने। होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी, या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की डोरी। नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो, लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।

  • Tuesday · 2 min

    Ma | Padma Sachdeva

    माँ । पद्मा सचदेव बुलाने के लिए कई नाम हैं जिसे पुकारो बोलता भी है पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो सब चौकन्ने हो जाते हैं सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं माँ... माँ... माँ... ओ लड़के ओ बेटा वह मेरी बेटी कहाँ मर गई हो माँ माँ माँ कहता जब कोई बच्चा गली में से निकलता है सड़क पार करता है या पहाड़ चढ़ता है पहाड़ उतरकर आँगन में आ खड़ा होता है तब माँ एकदम सुबह के गुलाब की तरह खिल उठती है दोनों दरवाज़े थाम कर देखती है गलियों में जाते, गुल्ली-डंडा घुमाते, गिट्टे उछालते माँ माँ कहकर लिपट जाते हैं माँ को सब एक तरह से ही बुलाते हैं मधुरता में नहला कर, चाव से भर कर ज़रा-सा डर कर आतुरता से माँ... माँ... माँ बछड़ा रंभाता है बां बां बां गाय कई बार रस्सी तोड़ने का यत्न करती है मालिक का कोई डर नहीं रहता कोई भी उलझन हो, कोई भी ख़ुशी हो, कोई भी उम्र हो कहता है माँ, माँ कहाँ हो तुम माँ हाय बाप कोई नहीं कहता

  • Monday · 2 min

    Dono Oar Prem Palta Hai | Maithilisharan Gupt

    दोनों ओर प्रेम पलता है। मैथिलीशरण गुप्त दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि, पतंग भी जलता है हां! दीपक भी जलता है। सीस हिलाकर दीपक कहता - ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’ पर पतंग पड़ कर ही रहता कितनी विह्वलता है दोनों ओर प्रेम पलता है। बचकर हाय! पतंग मरे क्या? प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या? जले नहीं तो मरा करे क्या? क्या यह असफ़लता है? दोनों ओर प्रेम पलता है। कहता है पतंग मन मारे- ’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे, क्या न मरण भी हाथ हमारे? शरण किसे छलता है?’ दोनों ओर प्रेम पलता है। दीपक के जलने में आली, फिर भी है जीवन की लाली। किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली, किसका वश चलता है? दोनों ओर प्रेम पलता है। जगती वणिग्वृत्ति है रखती, उसे चाहती जिससे चखती; काम नहीं, परिणाम निरखती। मुझको ही खलता है। दोनों ओर प्रेम पलता है।

  • Sunday · 1 min

    Lipi | Hemant Deolekar

    लिपि । हेमंत देवलेकर उन्होंने कहा -" लिखो" मैं मोबाइल पर टाइप करने लगा यह देख वे भड़क उठे -"हमने कहा, लिखो" मेरी याददाश्त पर गहरी चोट पड़ी और मोबाइल हाथ से गिर गया वे पूर्वज थे खिन्न होकर लौट गए मैने गिरे हए मोबाइल को देखा : मेरे हाथ से समूची लिपि फिसल गई थी

  • August 1 · 1 min

    Barsaat Mubarak Ho | Meena Kumari 'Naaz'

    बरसात मुबारक हो। मीना कुमारी नाज़ बरसात मुबारक हो ये साथ मुबारक हो हर दिन रहे सलोना हर रात मुबारक हो सँवलाई हुई शामों को हर सुब्ह मुबारक हो हिचकी हो या सिसकी हो हर नग़्मा मुबारक हो बरसात मुबारक हो बरसात मुबारक हो

  • July 31 · 2 min

    Kuch Sacchaiyaan Kuch Jhooth | Wazda Khan

    कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ । वाज़दा खान केवल मिसाइलें ही गहरे मारक असर नहीं करतीं जीवन में और भी बहुत कुछ है गहरा और असरदार कभी उतरो जो उन गहराइयों में जहां बेहद अन्धेरा है कहीं है चिड़िया की एक आवाज़ कहीं चट्टानों के बीच दबा कोई रंग कहीं दरारों में बिंधा रुदन निश्चित रूप से हर असर गहरा अन्धेरा नहीं होता मगर जो गहरा और असरदार है उनमें से कुछ सितारों के साथ, तो कुछ दूसरे ग्रह के सूर्य के साथ छप जाते हैं पानी से लेकर उन हवाओं तक जो पिछली सदी और उससे भी पिछली सदी में और आज तक एक जैसी है, पानी भी एक जैसा है मगर कुछ है जो बदलता जा रहा है तेज़ी से वक्त के साथ देख पाती हूं आंखों के भीतर चमकती धूप में पाती हूं तब कुछ सच्चाइयां, कुछ झूठ, कुछ गणनायें कुछ तथ्य, बहुत सारी चुप्पियां और तबाह कर देने वाला इक स्याह जुनून।

  • July 30 · 1 min

    Mustanda Aur Bachcha | Shubha

    मुस्टंडा और बच्चा। शुभा भाषा के अंदर बहुत सी बातें सबने मिलकर बनाई होती हैं इसलिए भाषा बहुत समय एक विश्वास की तरह चलती है जैसे हम अगर कहें बच्चा तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है एक परजीवी एक तानाशाह फिर भी हम कहते रहते हैं— बच्चा! ओहो बच्चा! और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है किसी उजड़े हुए बूढ़े में किसी ठगी गई औरत में किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में छिपकर जान बचाता है बच्चा अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ

  • July 29 · 2 min

    Pukare Ja Rahe Ho Ajnabee Se | Zafar Gorakhpuri

    पुकारे जा रहे हो अजनबी से । ज़फ़र गोरखपुरी पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो ख़ुद अपने शोर में गुम आदमी से चाहते क्या हो ये आँखों में जो कुछ हैरत है क्या वो भी तुम्हें दे दें बना कर बुत हमें अब ख़ामुशी से चाहते क्या हो न इत्मिनान से बैठो न गहरी नींद सो पाओ मियाँ इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से चाहते क्या हो उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में ये सब कुछ जान कर आवारगी से चाहते क्या हो किनारों पर तुम्हारे वास्ते मोती बहा लाए घरौंदे भी नहीं तोड़े नदी से चाहते क्या हो चराग़-ए-शाम-ए-तन्हाई भी रौशन रख नहीं पाए अब और आगे हवा की दोस्ती से चाहते क्या हो

  • July 28 · 1 min

    Bin Gharni Ghar Bhoot ka Dhera | Abha Bodhisattva

    बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्व हज़ारों ग्रहों में यह धरती बहुत छोटी-सी है, हज़ारों घरों में बहुत छोटा है तुम्हारा घर तुम्हारा छोटा-सा घर था, ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से भरा फिर भी तुम्हारा मन नहीं लगता था उससे तुमने अपने मनोरथ के लिए, लिया मेरा साथ, क्योंकि बिना घरनी के तुम्हारा घर था भूत का डेरा

  • July 27 · 2 min

    Kehte Hain Taare Gaate Hain | Harivansh Rai Bachchan

    कहते हैं, तारे गाते हैं! । हरिवंश राय बच्चन कहते हैं, तारे गाते हैं! सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं! कहते हैं, तारे गाते हैं! स्वर्ग सुना करता यह गाना, पृथ्वी ने तो बस यह जाना, अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं! कहते हैं, तारे गाते हैं! ऊपर देव तले मानवगण, नभ में दोनों गायन-रोदन, राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं! कहते हैं, तारे गाते हैं!

  • July 26 · 2 min

    Antim Sipahi Ki Tarah | Leeladhar Mandloi

    अंतिम सिपाही की तरह । लीलाधर मंडलोई मैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सका मैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैं मैं रस्मी मातम में शरीक़ नहीं मैं उन आवाज़ों में हूँ जिनमें मुक्ति का गान गूँजता है मैं उनके लिए अपनी घृणाओं को आकाश करना चाहता हूँ मैं न्याय के लिए अंतिम सिपाही की तरह जीत के लिए मर जाना चाहता हूँ।

  • July 25 · 1 min

    Har Baar Deewaar | Jyotsna Milan

    हर बार दीवार। ज्योत्स्ना मिलन आसमान होगा की उम्मीद में बाहर देखती खिड़की से बाहर दीवार होती सामने और होती फाँक भर धूप दो दीवारों के बीच धरी-सी दीवार की जगह आसमान नहीं निकला कभी घास का मैदान भी नहीं खिड़की के बाहर हर बार एक दीवार आसमान के बदले।

  • July 24 · 2 min

    Main Dhoondhta Hun Jisey | Kaifi Azmi

    मैं ढूँडता हूँ जिसे । कैफ़ी आज़मी मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

  • July 23 · 2 min

    Mujhko Tera Shabab Le Baitha | Shiv Kumar Batalvi

    मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवी अनुवाद: आकाश 'अर्श' मुझ को तेरा शबाब ले बैठा रंग, गोरा गुलाब ले बैठा दिल का डर था कहीं न ले बैठे ले ही बैठा जनाब ले बैठा जब भी फ़ुर्सत मिली है फ़र्ज़ों से तेरे रुख़ की किताब ले बैठा कितनी बीती है कितनी बाक़ी है मुझ को इस का हिसाब ले बैठा मुझ को जब भी है तेरी याद आई दिन-दहाड़े शराब ले बैठा अच्छा होता सवाल ना करता मुझ को तेरा जवाब ले बैठा 'शिव' को इक ग़म पे ही भरोसा था ग़म से कोरा जवाब ले बैठा

  • July 22 · 1 min

    Janamdin | Baby Shaw

    जन्मदिन । बेबी शॉ तुम्हें सोचते हुए रोज़ एक नई दुनिया रचती हूँ मिट्टी के चावल धूल की सब्ज़ी पत्ते की रोटी खेल-घर जैसी... एक ऐसी दुनिया जिसे कोई नहीं जानता जहाँ प्रकाश-लोभ से स्वयं को जलाती हूँ मैं...

  • July 21 · 2 min

    Apna Yatna Mein | Savita Singh

    अपनी यातना में । सविता सिंह वह सो चुकी थी कई नींदें कई दिन और रातें बीत चुकी थीं कई ज़िंदगियाँ बन और बिखर चुकी थीं इस बीच लेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा था जिसकी झालर को पकड़ वह उठी थी और उन फूलों को ढूँढ़ने लगी थी जिन्हें सीने से लगा वह सोने गई थी जागने पर यह संसार उसे अब भी बहुत जाना-पहचाना ही लगा था फूल भले अनुपस्थित थे लेकिन उसके प्रेमी वहाँ खड़े थे बाँहें फैलाए हर हाल में प्रेम बचा रहता है उसने सोचा था फिर आह्लादित हो ख़ुद से कहा था आसमान को छत और धरती को बिस्तर बना समुद्र की तरह कोई गीत गाना चाहिए तभी उसका एक प्रेमी उसे बालों से पकड़ खींचता हुआ ले गया नींद और सपनों से बाहर समेटे हुए अपने सीने में चुराए उसके सारे फूल जहाँ सब कुछ नया था अपनी यातना में

  • July 20 · 1 min

    Vismriti ka Phool | Gobind Prasad

    विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद ...मैं हूँ मैं हूँ किसी का ...हूँ किसी का सपना देखा हुआ अनदेखा अपना स्मृति में जैसे बसा-किसी की विस्मृति का फूल बन, खिलने की हसरत में दिन-रात तपना पहरों-पहरों, देह की देहरी पर रह-रहकर अंगार-सा दहकना