Skip to content
Artwork for Pratidin Ek Kavita
ArtsBooksFiction

Pratidin Ek Kavita

Nayi Dhara Radio

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

Play
  • 98 episodes
  • daily
  • Avg 2 min
  • Hindi
Counted on this page — what you have heard stays on this device, so it is not something the list can be paged by.
  • #1303
    Today · 2 min

    Kabhi Kabhi Yun Bhi Humne | Nida Fazli

    कभी कभी यूँ भी हम ने । निदा फ़ाज़ली कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है उस बस्ती से छुट कर यूँ तो हर चेहरे को याद किया जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें कीं घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

    • Transcript
  • #1302
    Yesterday · 1 min

    Main Dekh Raha Hun | Agyeya

    मैं देख रहा हूँ । अज्ञेय मैं देख रहा हूँ झरी फूल से पँखुरी - मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते। मैं चुप हूँ : वह मेरे भीतर वसंत गाता है।

    • Transcript
  • #1301
    Thursday · 1 min

    Jism Kya Hai Rooh Tak | Adam Gondvi

    जिस्म क्या है रूह तक । अदम गोंडवी जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़ उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये

    • Transcript
  • #1300
    Wednesday · 1 min

    Yaad | Kailash Vajpeyi

    याद । कैलाश वाजपेयी जहाँ में नहीं गया उन सभी देशों के वे सारे फूल मैं जिनके नाम नहीं जानता जैसे वसंत की प्रतीक्षा किए बिना खिल-खिल गए हों।

    • Transcript
  • #1299
    Tuesday · 2 min

    Kal Raat | Nida Fazli

    कल रात । निदा फ़ाज़ली कल रात वो थका हुआ चुप चुप उदास उदास सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया आंतों का दर्द नींद की परियों को खा गया झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दिया आकाश को समेट के नीचे गिरा दिया फैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दिया फिर कुछ नहीं न खेत, न मैदाँ, न रास्ते बस इक निगाह खिड़की की रंग-जालियाँ (बस तीन चार आने की दो चार गोलियां)

    • Transcript
  • #1298
    Monday · 1 min

    Wo Zamana Guzar Gaya Kab Ka | Javed Akhtar

    वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढता था जो इक नई दुनिया लूट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

    • Transcript
  • #1297
    Sunday · 2 min

    Zinda Rahein To Kya Hai | Muneer Niyazi

    ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या। दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या। हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या। अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ, शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या। दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र, दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या।

    • Transcript
  • #1296
    October 17 · 3 min

    Nayi Sanskriti | Doodhnath Singh

    नई संस्कृति । दूधनाथ सिंह आसमान में बसा हुआ नगर निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर, आपस में टकराते, जूझते मकान। बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोचते व्यवसायी जूतों के तल्लों में सोना चिपकाए कंधों पर लादे— मसान। बेतहाशा भागती हुई भीड़ अमर-बेलि की काली लतरों पर, और दुहरे चुटीले अँधेरे में गुँथे हुए पीली रोशनी के बियाबान। ढेर-सा सवेरा—अलकतरे से पुती किवाड़ों की फटी सनद में पिरोया-सा। भीतर एक गाए गए मौसम, एक वेगातुर धर्म, एक मर्यादित स्वार्थ की झूठी पहचान। शिशिर के बूढ़े पर्दे के पीछे ऋतुओं का एक ख़ाबगाह सभी जगह कत्थक या गरबा की अनगिन मदमाती मुद्राएँ और वसंत की ओस में नम एक सड़क का गुन-गुन गान। फिर बहुत दिन बाद नींव में मरी हुई निर्वसन हवा... टूटा हुआ नगर-कंकाल-आसमान। अमर बेलि की काली लतरों पर अँधेरी रोशनियों में उगते जंगली पेड़ों की तरह इंसान।

    • Transcript
  • #1295
    October 16 · 1 min

    Maun | Arti Abodh

    मौन । आरती अबोध अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।

    • Transcript
  • #1294
    October 15 · 1 min

    Prem Ke Baare Mein Ek Shabd Nahi | Viren Dangwal

    प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं । वीरेन डंगवाल शहद के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा वह जो बहुश्रुत संकलन था सहस्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव न जाने कब एक तर्जनी की पोर से चखी थी उसकी श्यानता गई नहीं अब भी वह काकु से तालु से जीभ के बीचों-बीच से आँखों की शीतलता में भी वही प्रेम के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।

    • Transcript
  • #1293
    October 14 · 2 min

    Ghar Ek Muktibodh-Numa Kavita Hai | Kumar Divyanshu Shekhar

    घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है । कुमार दिव्यनशु शेखर कुल जमा चार लोग रहते हैं छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है। अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!' एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है धुरी में भविष्य छुपकर बैठ जाता है। अलग-अलग अँधेरे हिस्सों में चहारदीवारी के बाहर लटके हैं― नरभक्षियों के मुंड अपहरण करना चाहते हैं धुरी में छुपे भविष्य का। घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है। मुझे डर है― वो लड़का जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है बन न जाए ब्रह्मराक्षस...

    • Transcript
  • #1292
    October 13 · 1 min

    Kharepan Ka Ehsaas | Kanhaiya Lal Nandan

    खारेपन का अहसास । कन्हैयालाल नंदन खारेपन का अहसास मुझे था पहले से पर विश्वासों का दोना सहसा बिछल गया कल, मेरा एक समंदर गहरा-गहरा सा मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।

    • Transcript
  • #1291
    October 12 · 1 min

    Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi

    खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा नए साल में हम खुट जाएँ खुट जाएँ मतलब.. खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ ही ही हा हा ही हा अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल से जबरिया हँसी को रोकती बोली क्यों खुटने से डरते हो ??? हम तो रोज़ खुटते हैं…

    • Transcript
  • #1290
    October 11 · 1 min

    Ek Baar | Rajula Shah

    एक बार । राजुला शाह बह जाने देना उड़ जाने देना अपने आप को एक बार तुम भी। गुब्बारे-सा हवा के बुलबुले-सा हल्का होगा तुम्हारा मन और कहीं भी जा सकेगा बिला रोक-टोक फिर- प्रेम से इन्तज़ार में इन्तज़ार से मौन में मौन से निपट शून्य में और तुम्हें लगेगा, सबसे ताकतवर हो तुम ऊपर और ऊपर और ऊपर उठते हुए....

    • Transcript
  • #1289
    October 10 · 2 min

    Chandini | Ramvilas Sharma

    चाँदनी । रामविलास शर्मा चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुहरे पर भीगी चाँदनी; आँखों में बादल-से आँसू, हँसती है उन पर चाँदनी। दु:ख की दनिया पर बुनती है माया के सपने चाँदनी। मीठी मुस्कान बिछाती है भीगी पलकों पर चाँदनी। लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख, सपनों-सी झूठी चाँदनी; लोहे से दु:ख को काटे क्या सपनों-सी मीठी चाँदनी। यह चाँद चुरा कर लाया है सूरज से अपनी चाँदनी। सूरज निकला, अब चाँद कहाँ? छिप गई लाज से चाँदनी। दु:ख और कर्म का यह जीवन, वह चार दिनों की चाँदनी। यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर, वह अंधकार की चाँदनी।

    • Transcript
  • #1288
    October 9 · 2 min

    Parcham | Kumar Ambuj

    परचम। कुमार अम्बुज वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला कोई उसे छू भी नहीं रहा है किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा लेकिन देखो, वह खिला हुआ है बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को जज़्ब करते हुए एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में आसपास की हर चीज़ इशारा करती है तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू दुर्दिनों के किनारे शब्द मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है जैसे पेड़ की यह छाँह मंज़िल नहीं यह समाज जो आख़िर एक दिन आज़ाद होगा उसकी संभावना मरते हए आदमी की आँखों में है और असफलता मृत्यु नहीं है यह जीवन है, धोखेबाज़ पर भी मुझे विश्वास करना होगा निराशाएँ अपनी गतिशीलता में आशाएँ हैं 'मैं रोज़ परास्त होता हूँ'- इस बात के कम से कम बीस अर्थ हैं यों भी एक-दो अर्थ देकर टिप्पणीकार काफ़ी कुछ नक़सान पहुँचा चुके हैं गणनाएँ असंख्य को संख्या में न्यून करती चली जाती हैं सतह पर जो चमकता है वह परावर्तन है उसके नीचे कितना कुछ है अपार शांत, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ।

    • Transcript
  • #1287
    October 8 · 2 min

    Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar

    बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का पाखण्ड-पर्व कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की चहारदीवारी में आत्महत्या का अनायास आदर्श नहीं होता बुरी औरत के सपनों में। बुरी औरत के सपनों में आता है एक स्वच्छन्द बहती हुई नदी का दृश्य और मनचाहे फूल पर बैठती हुई तितली के पंख बुरी औरत के सपनों में बार-बार आता है जिबह करने को लाया जाता ख़ूबसूरत मेमना उसके स्वच्छन्द बहते रंगों पर टपक जाते हैं किसी निर्दोष आत्मा के पवित्र प्रेमाश्रु बुरी औरत के सपनों में उबलता है बुरे लोगों के बुरे कामों के विरूद्ध हृदय का लावा ।

    • Transcript
  • #1286
    October 7 · 2 min

    Prem Ki Anivaaryata | Hemant Deolekar

    प्रेम की अनिवार्थता । हेमंत देवलेकर बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर देने का भोलापन, तर्क न करने की सहजता और रोने की मानवीय उपलब्धि प्रेम ने हमारी ऊबड़ - खाबड़, जाहिल-सी भाषा को कविता की कला सिखाई और ज़िन्दगी के घोर कोलाहल में एकांत की दुआ मांगना संभव नहीं था प्रेम के बिना सुंदरता का अर्थ समझना प्रेम होना ही सबसे बड़ी सफलता है कोई असफल कैसे हो सकता है प्रेम में ...

    • Transcript
  • #1285
    October 6 · 1 min

    Sandhya Vandana | Sumitranandan Pant

    सांध्य वंदना । सुमित्रानंदन पंत जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व नीड प्रच्छाय करो हे! उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल, स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि! सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!

    • Transcript
  • #1284
    October 5 · 3 min

    Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma

    आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा आज शाम है बहुत उदास केवल मैं हूँ अपने पास । दूर कहीं पर हास-विलास दूर कहीं उत्सव-उल्लास दूर छिटक कर कहीं खो गया मेरा चिर-संचित विश्वास । कुछ भूला सा और भ्रमा सा केवल मैं हूँ अपने पास एक धुन्ध में कुछ सहमी सी आज शाम है बहुत उदास । एकाकीपन का एकान्त कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त । थकी-थकी सी मेरी साँसें पवन घुटन से भरा अशान्त, ऐसा लगता अवरोधों से यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त। अंधकार में खोया-खोया एकाकीपन का एकान्त मेरे आगे जो कुछ भी वह कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त। उतर रहा तम का अम्बार मेरे मन में व्यथा अपार। आदि-अन्त की सीमाओं में काल अवधि का यह विस्तार क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर ? एक प्रश्न मैं हूँ साकार। क्यों बनना? क्यों बनकर मिटना? मेरे मन में व्यथा अपार औ समेटता निज में सब कुछ उतर रहा तम का अम्बार। सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास, आज शाम है बहुत उदास। जोकि आज था तोड़ रहा वह बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस और अनिश्चित कल में ही है मेरी आस्था, मेरी आस। जीवन रेंग रहा है लेकर सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास, और डूबती हुई अमा में आज शाम है बहुत उदास।

    • Transcript
Showing 1–20 of 98 episodes