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Artwork for Pratidin Ek Kavita
Pratidin Ek Kavita · July 20 · 1 min

Vismriti ka Phool | Gobind Prasad

विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद ...मैं हूँ मैं हूँ किसी का ...हूँ किसी का सपना देखा हुआ अनदेखा अपना स्मृति में जैसे बसा-किसी की विस्मृति का फूल बन, खिलने की हसरत में दिन-रात तपना पहरों-पहरों, देह की देहरी पर रह-रहकर अंगार-सा दहकना

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विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद


...मैं हूँ

मैं हूँ किसी का


...हूँ किसी का

सपना


देखा हुआ अनदेखा

अपना


स्मृति में जैसे बसा-किसी की

विस्मृति का फूल


बन, खिलने की हसरत में

दिन-रात तपना


पहरों-पहरों, देह की देहरी पर

रह-रहकर अंगार-सा


दहकना