
Pratidin Ek Kavita · July 20 · 1 min
Vismriti ka Phool | Gobind Prasad
0:00-1:20
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विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद
...मैं हूँ
मैं हूँ किसी का
...हूँ किसी का
सपना
देखा हुआ अनदेखा
अपना
स्मृति में जैसे बसा-किसी की
विस्मृति का फूल
बन, खिलने की हसरत में
दिन-रात तपना
पहरों-पहरों, देह की देहरी पर
रह-रहकर अंगार-सा
दहकना





