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Pratidin Ek Kavita · Yesterday · 1 min

Upeksha | Subhadra Kumari Chauhan

उपेक्षा । सुभद्राकुमारी चौहान इस तरह उपेक्षा मेरी, क्यों करते हो मतवाले! आशा के कितने अंकुर, मैंने हैं उर में पाले॥ विश्वास-वारि से उनको, मैंने है सींच बढ़ाए। निर्मल निकुंज में मन के, रहती हूँ सदा छिपाए॥ मेरी साँसों की लू से कुछ आँच न उनमें आए। मेरे अंतर की ज्वाला उनको न कभी झुलसाए॥ कितने प्रयत्न से उनको, मैं हृदय-नीड़ में अपने बढ़ते लख खुश होती थी, देखा करती थी सपने॥ इस भांति उपेक्षा मेरी करके मेरी अवहेला तुमने आशा की कलियाँ मसलीं खिलने की बेला॥

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उपेक्षा ।  सुभद्राकुमारी चौहान


इस तरह उपेक्षा मेरी,

क्यों करते हो मतवाले!

आशा के कितने अंकुर,

मैंने हैं उर में पाले॥


विश्वास-वारि से उनको,

मैंने है सींच बढ़ाए।

निर्मल निकुंज में मन के,

रहती हूँ सदा छिपाए॥


मेरी साँसों की लू से

कुछ आँच न उनमें आए।

मेरे अंतर की ज्वाला

उनको न कभी झुलसाए॥


कितने प्रयत्न से उनको,

मैं हृदय-नीड़ में अपने

बढ़ते लख खुश होती थी,

देखा करती थी सपने॥


इस भांति उपेक्षा मेरी

करके मेरी अवहेला

तुमने आशा की कलियाँ

मसलीं खिलने की बेला॥