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Pratidin Ek Kavita · Friday · 3 min

Shraadh | Ashutosh Sharma

श्राद्ध - आशुतोष शर्मा किसी चींटी को बचपन में कुचला था केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या झूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह उपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल बहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां मारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर पत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना अग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म गंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़ पीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्ण संस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पाप मृत्यु पर सिरहाने मेरे पंजे जूते चप्पल ककड़ पत्थर और छिपकलियां थी किन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थे चींटी बुलबुल केंचुए भिखारी बस्ते उपेक्षित और झूले कुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएं किसी शास्त्रीय वर्जना के कारण जीते जी नहीं आ सकते शमशान उनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझ नहीं उठा सकती मेरी आत्मा।

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श्राद्ध - आशुतोष शर्मा 


किसी चींटी को बचपन में कुचला था

केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता

छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को

किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या

झूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह

उपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल

बहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां

मारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर

पत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना


अग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म

गंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़

पीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्ण

संस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पाप

मृत्यु पर सिरहाने मेरे

पंजे जूते चप्पल

ककड़ पत्थर और छिपकलियां थी

किन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थे

चींटी बुलबुल केंचुए 

भिखारी बस्ते उपेक्षित और झूले

कुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएं

किसी शास्त्रीय वर्जना के कारण

जीते जी नहीं आ सकते शमशान

उनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझ

नहीं उठा सकती मेरी आत्मा।

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